Friday, April 17, 2020

बिजोलिया किसान आंदोलन

बिजोलिया किसान आंदोलन

  • राजस्थान में संगठित जन-जागृति करने का श्रेय बिजोलिया किसान आंदोलन को जाता है
  •  बिजोलिया का सबसे प्राचीन नाम विजयाबल्ली है
  • अशोक परमार द्वारा संस्थापित  बिजोलिया मेवाड़ राज्य का प्रथम श्रेणी का ठिकाना था
  •  अशोक परमार का मूल निवास स्थान जगनेर (भरतपुर) (वर्तमान में उत्तर प्रदेश के आगरा जिले का जगनेर) था, जहां से वह मेवाड़ के राणा सांगा की शरण में चित्तौड़ आ गया|
  • अशोक परमार ने राणा सांगा के साथ 1527 ईस्वी में खानवा युद्ध में बाबर की सेना के विरुद्ध अपूर्ण साहस का परिचय दिया था
  •  सांगा ने अशोक परमार की वीरता से प्रभावित होकर उसे 256 वर्ग किलोमीटर में फैला ऊपरमाल की जागीर प्रदान की जिसका बिजोलिया सदर मुकाम था
  •  19वीं शताब्दी के आरंभ में अंग्रेजों से हुई संधि के फलस्वरूप राजस्थान के राजा बाहरी आक्रमणों मराठों व पिंडारीयों के आतंक से मुक्त पाकर स्वेच्छाचारी हो गए तथा स्वच्छंद ऐसो आराम की जिंदगी बिताने के लिए यह राजा महाराजा तथा उनके जागीरदार जनता पर विभिन्न प्रकार के कर लगाते गए जिससे किसानों का शोषण शोषण उन पर अत्याचार और बेगारी का आलम अधिक बढ़ गया
  •  राजाओं-महाराजाओं और जागीरदारों के इस स्वेच्छाचारी आचरण से किसानों में असंतोष बढ़ गया जिसका पहला विस्फोट सन 1897 ईस्वी में मेवाड़ के जागीर क्षेत्र बिजोलिया में हुआ
  • राव कृष्ण सिंह के समय बिजोलिया जागीर से भारी लगान के अलावा 84 प्रकार की लागते तथा बाग-बेगारी ली जाती थी
  • सन 1897 ईस्वी में बिजोलिया के किसानों ने गिरधारीपुर नामक गांव में किसानों ने नानजी पटेल और ठाकरे पटेल को उन पर हो रहे अमानवीय अत्याचारों की शिकायत करके महाराणा के पास उदयपुर भेजा मगर महाराणा ने उनकी शिकायत पर कोई कार्यवाही नहीं की |
  •  यह आंदोलन 1897 ईस्वी में ही प्रारंभ हो गया था 1916 ईस्वी के बाद विजय सिंह पथिक ने इसका नेतृत्व किया |
  • भारत में संगठित कृषक  आंदोलन प्रारंभ करने का श्रेय मेवाड़ को है|
  • बिजोलिया किसान आंदोलन 1897 ईस्वी से 1941 ईस्वी तक चला बिजोलिया मेवाड़ रियासत का ठिकाना था यह किसान आंदोलन सबसे लंबे समय तक चला था अहिंसात्मक है|
  • बिजोलिया ठिकाने में 84 प्रकार के कर लिए जाते थे इनके अतिरिक्त किसानों से लागबाग एवं बेगार भी ली जाती थी|
  • तुलसी भील बिजोलिया आंदोलन में किसान का एक असाधारण संदेशवाहक था|
  • धाकड़ इस जाति के किसान यह सर्वाधिक संख्या में थे|
  • कुंता बिजोलिया ठिकाने में भूमि कर निश्चित करने की प्रथा थी|
  •  विजय सिंह पथिक ने चित्तौड़ के समीप ओछड़ी गांव में किसानों के बीच कार्य करने करते हुए विद्या प्रचारिणी सभा की स्थापना की |
  • 1916 में पथिक, माणिक्य लाल वर्मा व साधु सीताराम के सहयोग से विद्या प्रचारिणी सभा के माध्यम से बिजोलिया के किसानों को संगठित किया|
  •  बिंदु लाल भट्टाचार्य आयोग (1919वी) ने बिजोलिया किसान आंदोलन में बूंदी किसान को मुक्त किया|
  • राजस्थान केसरी 1920 में पथिक जी ने इस अखबार के माध्यम से किसानों की आवाज देशवासियों तक पहुंचाई थी|
  • पथिक ने बिजोलिया किसान आंदोलन को भारतीय स्तर लोकप्रिय प्रताप नामक समाचार पत्र के माध्यम से बनाया,  जिस के प्रकाशक गणेश शंकर विद्यार्थी थे तथा कानपुर से प्रकाशित होता था|

Thursday, April 16, 2020

राजस्थान में डाकन प्रथा


डाकन प्रथा
कोई महिला तंत्र मंत्र की शक्ति से इंसानों को मारकर खा जाती है ऐसा झूठा आरोप लगाकर किसी महिला को प्रताड़ित करना या मार देना डाकन प्रथा है       
  • सर्वप्रथम इस प्रथा पर रोक खेरवाड़ा (उदयपुर) मेवाड़ रियासत में एम.बी.सी. (मेवाड़ भील कोर) का कमांडर जै.सी.ब्रॉक ने देखा और उस समय के राजा स्वरूप सिंह ने इस पर रोक लगाई 1853 में |
  •  2015 में राजस्थान की वसुंधरा राजे सिंधिया ने डाकन प्रताड़ना अधिनियम बनाकर किसी महिला को  डाकण शब्द से संबोधन करना भी अपराध माना जाएगा ऐसी घोषणा कर दी. 

राजस्थान में ऊन उद्योग

राजस्थान में ऊन उद्योग
           ऊन उत्पादन में भारत में राजस्थान का प्रथम स्थान है भारत की 33% ऊन का उत्पादन राजस्थान में होता है राजस्थान में भेड़ों की सर्वाधिक संख्या बाड़मेर जिले में है सर्वाधिक मात्रा में ऊन देने वाली भेड़ों की नस्ल जैसलमेरी है चोकला भेड़ की ऊन सर्वोत्तम कोटी की मानी जाती है इसीलिए इसे भारत की मेरिनो कहा जाता है मेरिनो आस्ट्रेलिया की भेड़  है राजस्थान में चोकला भेड़ शेखावाटी क्षेत्र में पाई जाती है राजस्थान में ऊन का सर्वाधिक उत्पादन जोधपुर जिले में होता है|

  • एशिया की सबसे बड़ी ऊन मंडी बीकानेर में है
  • स्टेट बुलन मील बीकानेर में है
  • गलीचा प्रशिक्षण केंद्र बीकानेर  में है
  • केंद्रीय ऊन बोर्ड जोधपुर में है
  • ऊन प्रशिक्षण केंद्र जयपुर में है
  • ऊन निर्यात संवर्धन केंद्र कोटा में है
  • केंद्रीय भेड़ व ऊन अनुसंधान केंद्र अविकानगर (मालपुरा) टोंक में है

राजस्थान में कांच उद्योग

           राजस्थान में कांच उद्योग
  •   राजस्थान का धौलपुर जिला का उद्योग के लिए प्रसिद्ध है यहां राजस्थान सरकार की हाईटेक प्रोसीजर ग्लास वर्क्स कारखाना है जो गंगानगर शुगर मिल के अधीन है
  • राजस्थान के कोटा में सैंकोर ग्लास  फैक्ट्री है  जो दक्षिण कोरिया की है इसमें टेलीविजन की पिक्चर ट्यूब बनाने के कारखाने हैं जो फिलहाल बंद है
  •  रेवारी अलवर में सैंट गोबैन ग्लास फैक्ट्री है जो फ्रांस की है इसमें दरवाजे व खिड़की के मोटे कांच बनाए जाते हैं

संगमरमर उद्योग

           
  संगमरमर उद्योग
 संगमरमर में भारत में राजस्थान का प्रथम स्थान है भारत का 90% से अधिक संगमरमर राजस्थान में है राजस्थान में सर्वाधिक भंडारण राजसमंद में है मकराना नागौर का सबसे संगमरमर विश्व प्रसिद्ध है जो आगरा के ताजमहल में लगाया गया है किशनगढ़ (अजमेर) में एशिया की सबसे बड़ी मार्बल मंडी है संगमरमर की मूर्तियां में खिलौने का प्रसिद्ध केंद्र जयपुर है

  • सफेद संगमरमर मकराना नागौर में निकाला जाता है
  • काला संगमरमर भैसलाना जयपुर में निकाला जाता है
  • हरा संगमरमर उदयपुर में निकाला जाता है
  • पीला संगमरमर जैसलमेर में निकाला जाता है
  • गुलाबी संगमरमर जालौर में निकाला जाता है
  • बादामी संगमरमर जोधपुर में निकाला जाता है
  •  लाल संगमरमर धौलपुर में निकाला जाता है
  • सतरंगी संगमरमर पाली में निकाला जाता है
चितकबरा या लहरदार संगमरमर राजसमंद में निकाला जाता है

संगमरमर पर कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

1.राजस्थान में अनेक स्थानों पर संगमरमर निकाला जाता है मकराना में बड़े पैमाने पर संगमरमर और भैसलाना में काला पत्थर निकाला जाता है

2. संगमरमर नागौर, पाली, सिरोही, बूंदी, उदयपुर, राजसमंद, डूंगरपुर व जयपुर जिले में भी प्राप्त होता है इस संगमरमर से जयपुर और अलवर के क्षेत्रों में संगमरमर की मूर्तियां बनाई जाती है

3. जयपुर मूर्ति कला का विशेष केंद्र है यहां विभिन्न देवी-देवताओं, महापुरुषों, संतों, महात्माओं आदि की मूर्तियां  निर्मित की जाती है

4 जयपुर के अतिरिक्त अलवर के निकट किशोरी ग्राम में भी संगमरमर की ग्रीन मार्बल मूर्तियां एवं घरेलू उपयोग की वस्तुएं निर्मित की जाती है


राजस्थान में स्थापत्य शैली

   राजस्थान में जैन स्थापत्य शैली

  • इनमें अधिकांश इमारतें पक्की जमीन पर बनाई जाती थी|
  • उनकी बुनियादी गहराई रखी जाती थी|
  • इमारतों की कुर्सी ऊंची रखी जाती थी|
  • भवनों में तहखाने भी बनाए जाते थे|
  • स्तंभ, स्तूप तथा कटी हुई जालियों का प्रयोग किया जाता      था|
  • छज्जे और ताक भी बनाए जाते थे|
  • आंगन कम होते थे और कमरों में रोशनदान नहीं रखे जाते     थे|
  • भवनों के छत सपाटदार होती थी दरवाजे सीधे परंतु सुंदर      ढंग से बनाए जाते थे दरवाजों के निर्माण में दोहोरी चौखट      का प्रयोग किया जाता था
  • इमारत पत्थर से बनाई जाती थी
  • पत्थर में सुंदरता लाने के लिए संगतराशि की जाती थी

रणकपुर जैन मंदिर