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Thursday, April 16, 2020

राजस्थान में डाकन प्रथा


डाकन प्रथा
कोई महिला तंत्र मंत्र की शक्ति से इंसानों को मारकर खा जाती है ऐसा झूठा आरोप लगाकर किसी महिला को प्रताड़ित करना या मार देना डाकन प्रथा है       
  • सर्वप्रथम इस प्रथा पर रोक खेरवाड़ा (उदयपुर) मेवाड़ रियासत में एम.बी.सी. (मेवाड़ भील कोर) का कमांडर जै.सी.ब्रॉक ने देखा और उस समय के राजा स्वरूप सिंह ने इस पर रोक लगाई 1853 में |
  •  2015 में राजस्थान की वसुंधरा राजे सिंधिया ने डाकन प्रताड़ना अधिनियम बनाकर किसी महिला को  डाकण शब्द से संबोधन करना भी अपराध माना जाएगा ऐसी घोषणा कर दी. 

राजस्थान में ऊन उद्योग

राजस्थान में ऊन उद्योग
           ऊन उत्पादन में भारत में राजस्थान का प्रथम स्थान है भारत की 33% ऊन का उत्पादन राजस्थान में होता है राजस्थान में भेड़ों की सर्वाधिक संख्या बाड़मेर जिले में है सर्वाधिक मात्रा में ऊन देने वाली भेड़ों की नस्ल जैसलमेरी है चोकला भेड़ की ऊन सर्वोत्तम कोटी की मानी जाती है इसीलिए इसे भारत की मेरिनो कहा जाता है मेरिनो आस्ट्रेलिया की भेड़  है राजस्थान में चोकला भेड़ शेखावाटी क्षेत्र में पाई जाती है राजस्थान में ऊन का सर्वाधिक उत्पादन जोधपुर जिले में होता है|

  • एशिया की सबसे बड़ी ऊन मंडी बीकानेर में है
  • स्टेट बुलन मील बीकानेर में है
  • गलीचा प्रशिक्षण केंद्र बीकानेर  में है
  • केंद्रीय ऊन बोर्ड जोधपुर में है
  • ऊन प्रशिक्षण केंद्र जयपुर में है
  • ऊन निर्यात संवर्धन केंद्र कोटा में है
  • केंद्रीय भेड़ व ऊन अनुसंधान केंद्र अविकानगर (मालपुरा) टोंक में है

राजस्थान में कांच उद्योग

           राजस्थान में कांच उद्योग
  •   राजस्थान का धौलपुर जिला का उद्योग के लिए प्रसिद्ध है यहां राजस्थान सरकार की हाईटेक प्रोसीजर ग्लास वर्क्स कारखाना है जो गंगानगर शुगर मिल के अधीन है
  • राजस्थान के कोटा में सैंकोर ग्लास  फैक्ट्री है  जो दक्षिण कोरिया की है इसमें टेलीविजन की पिक्चर ट्यूब बनाने के कारखाने हैं जो फिलहाल बंद है
  •  रेवारी अलवर में सैंट गोबैन ग्लास फैक्ट्री है जो फ्रांस की है इसमें दरवाजे व खिड़की के मोटे कांच बनाए जाते हैं

राजस्थान में स्थापत्य शैली

   राजस्थान में जैन स्थापत्य शैली

  • इनमें अधिकांश इमारतें पक्की जमीन पर बनाई जाती थी|
  • उनकी बुनियादी गहराई रखी जाती थी|
  • इमारतों की कुर्सी ऊंची रखी जाती थी|
  • भवनों में तहखाने भी बनाए जाते थे|
  • स्तंभ, स्तूप तथा कटी हुई जालियों का प्रयोग किया जाता      था|
  • छज्जे और ताक भी बनाए जाते थे|
  • आंगन कम होते थे और कमरों में रोशनदान नहीं रखे जाते     थे|
  • भवनों के छत सपाटदार होती थी दरवाजे सीधे परंतु सुंदर      ढंग से बनाए जाते थे दरवाजों के निर्माण में दोहोरी चौखट      का प्रयोग किया जाता था
  • इमारत पत्थर से बनाई जाती थी
  • पत्थर में सुंदरता लाने के लिए संगतराशि की जाती थी

रणकपुर जैन मंदिर